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केंद्र के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं : सुशील मोदी

पटना। सांसद एवं पूर्व डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि तकनीकी एवं व्यावहारिक तौर पर केंद्र सरकार के लिए जातीय जनगणना कराना संभव नहीं है। केंद्र सरकार ने इस सबंध में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। राज्य अगर चाहे, तो जातीय जनगणना कराने के लिए स्वतंत्र है।

1931 की जातीय जनगणना में 4147 जातियां थीं। केंद्र एवं राज्यों के पिछड़े वर्गों की सूची मिलाकर मात्र 5629 जातियां हैं। 2011 में सामाजिक-आर्थिक गणना में जातियों की संख्या बढ़कर करीब 46 लाख हो गई। लोगों ने इसमें अपना गोत्र, जाति, उपजाति एवं उपनाम दर्ज करा दिया। इसलिए जातियों का शुद्ध आंकड़ा प्राप्त करना संभव नहीं हो पाया। सुशील कुमार मोदी ने कहा कि यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। लोगों को कोर्ट के फ़ैसले का इंतजार करना चाहिए या जो राज्य चाहे, तो वहां अपना पक्ष रख सकते हैं। 

जातीय जनगणना का मामला केवल एक कॉलम जोड़ने का नहीं है। इस बार इलेक्ट्रॉनिक टैब के जरिए गणना होनी है। गणना की प्रक्रिया अमूमन चार साल पहले शुरू हो जाती है। इनमें पूछे जाने वाले प्रश्न, उनका 16 भाषाओं में अनुवाद, टाइम टेबल और मैन्युअल आदि का काम पूरा हो चुका है। अंतिम समय में इसमें किसी प्रकार का बदलाव संभव नहीं है।

राज्यों की अलग-अलग स्थितियां हैं। पांच राज्यों में ओबीसी नहीं हैं, चार राज्यों की कोई राज्य सूची नहीं है। कुछ राज्यों में अनाथ एवं गरीब बच्चों को ओबीसी की सूची में शामिल किया गया है। कर्नाटक सरकार ने 2015 में जातीय जनगणना कराई थी, लेकिन आज तक उसके आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए जा सके हैं।
 


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