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बाल बजट से बच्चों के विकास में मिल रही मदद

पटना। डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद ने कहा कि 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 18 वर्ष तक उम्र वाले बच्चों की आबादी पांच करोड़ है। इन बच्चों का 90 प्रतिशत हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है। बाल बजट से इन बच्चों के विकास में मदद मिल रही है। बिहार देश के उन तीन राज्यों में हैं, जहां 2013-14 से ही बाल बजट का निर्माण किया जा रहा है।

डिप्टी सीएम बाल बजट निर्माण के लिए मैनुअल लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। मैनुअल को राज्य सरकार के वित्त विभाग, यूनीसेफ, बिहार एवं एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री) ने तैयार किया है।

डिप्टी सीएम ने कहा कि पिछले नौ वर्षों में बच्चों के विकास के लिए आवंटन और व्यय में लगातार वृद्धि हुई है। 2013-14 से 2019-20 के बीच बच्चों के लिए समग्र व्यय में 22.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज हुई है। राज्य सरकार कन्या उत्थान योजना जैसी योजनाओं से लड़कियों की स्थिति में सुधार के लिए काम कर रही है। नए स्कूल भी खोले गए हैं।

वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव डॉ एस. सिद्धार्थ ने कहा कि बाल बजट में लड़कियों के लिए एक अलग अध्याय होना चाहिए। साथ ही प्रगति का लगातार अनुश्रवण किया जाना चाहिए। बिहार में अधिकतर माता-पिता 14 साल की उम्र होते ही अपनी लड़की की शादी करने की सोचने लगते हैं।

इस समस्या को दूर करने के लिए राज्य सरकार लड़कियों को स्नातक तक पढ़ाने में मदद कर रही है। इससे लड़कियों के सशक्तिकरण और प्रजनन दर घटाने में मदद मिलेगी। उनका सुझाव था कि बाल बजट निर्माण अभ्यास के परिणाम को मापने के लिए भी अध्ययन होने चाहिए।

बिहार यूनीसेफ की प्रधान नफीसा बिंते शफीक ने कहा कि शुरू में बाल बजट में आठ विभाग शामिल थे, लेकिन अब इसके लिए 11 विभाग सूचनाएं देंगे। आद्री के सदस्य सचिव डॉ. प्रभात घोष ने कहा कि शिशु मृत्यु दर के मामले में बिहार राष्ट्रीय स्तर के समकक्ष पहुंच रहा है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा नहीं है।

यूनीसेफ के प्रशांत ऐश, सीईपीपीएफ की डॉ बर्ना गांगुली, योजना एवं विकास विभाग के पूर्व अपर निदेशक प्रमोद कुमार वर्मा एवं वित्त विभाग के बजट अधिकारी संजीव मित्तल ने भी अपने विचारों को रखा।

 


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