पटना। धान बिहार की प्रमुख फसल है। किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत मिले। इसके लिए सरकार एवं राइस मिल एसोसिएशन भी प्रयासरत है। साथ ही मिलर्स की भी कुछ परेशानियां हैं, जिन पर सरकार विचार करे तो सूबे में यह उद्योग काफी तरक्की करेगा। बिहार राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजू गुप्ता का कहना है कि सरकार हर साल धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जारी करती है। यदि राइस मिल द्वारा एमएसपी पर खरीदे गए धान से तैयार चावल की खरीद सरकार कर ले, तो यह इस उद्योग के लिए काफी फायदेमंद होगा। 2016 में आयोजित उद्यमी पंचायत में मुख्यमंत्री ने इस व्यवस्था के लिए खाद्य व आपूर्ति विभाग को निर्देश दिया था, लेकिन कोई नतीजा नहीं आया। फिलहाल बिहार में 3000 राइस मिल हैं। बाजार नहीं रहने व पूंजी की कमी के कारण धान का स्टाॅक करना संभव नहीं है। इस कारण बिचैलिए किसानों से धान काफी कम कीमत पर खरीद कर दूसरे राज्यों में भेज देते हैं।
एसोसिएशन के उपाध्यक्ष राकेश गुप्ता ने बताया कि हर साल एक करोड़ बीस लाख मैट्रिक टन धान का उत्पादन राज्य में होता है। पैक्स 20 लाख मैट्रिक टन और मिलर्स मात्र 10 लाख मैट्रिक टन धान की खरीद कर पाते हैं। शेष 90 लाख मैट्रिक टन धान दूसरे राज्य पंजाब, यूपी, हरियाणा, कर्णाटक और आंध्रप्रदेश चला जा रहा है।
महासचिव मुन्ना सिंह बताते हैं कि पीडीएस के तहत 40 लाख मैट्रिक टन चावल की जरूरत है। जबकि पैक्स के द्वारा खरीदे गए धान से तैयार चावल 12 लाख मैट्रिक टन ही है। शेष 28 लाख मैट्रिक टन चावल सरकार दूसरे राज्यों से खरीद रही है। यदि यह सुविधा बिहार के राइस मिलर्स को मिल जाए, तो यह उद्योग के लिए लाभदायक होगा। अन्य राज्यों में यह व्यवस्था है। इससे रोजगार का भी सृजन होगा।
लखीसराय चैंबर आॅफ काॅमर्स के अध्यक्ष रामचंद्र प्रसाद ने कहा कि अधिक बिजली दर भी उद्योग के लिए ठीक नहीं है। पहले 35 फीसदी अनुदान था, जिसे जून 2016 से बंद कर दिया गया है। मौके पर सचिव आनंद सिंह व सदस्य विजय कुमार गुप्ता भी मौजूद थे।