पटना। किसान प्रायः फसलों की कटाई के बाद खेत में बचे फसलों के अवशेष जैसे लार, पुआल व भूसा को खेतों में ही जला देते हैं। यह खतरनाक प्रवृत्ति है। ऐसा करने से खेत की मिट्टी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही पर्यावरण भी प्रदूषित होता है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। दिल्ली में कई दिनों से जारी धुंध की एक वजह समीप के राज्यों में किसानों द्वारा फसलों के अवशेष को जलाना भी है। इससे वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड की मात्रा बढ़ती है। इस कारण प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं।
कृषि मंत्री डाॅ प्रेम कुमार ने किसानों से अपील की है कि यदि धान की कटनी हार्वेस्टर से की गई है, तो खेत में फसलों के अवशेष को जुताई करके मिट्टी में मिला देना चाहिए। इससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकती है। यदि आवश्यक हो, तो खेत की सफाई के लिए बेलर मशीन का प्रयोग करें तथा हैप्पी सीडर से गेहूं की बुआई करें।
उन्होंने बताया कि धान काटने के बाद आलू और गेहूं जैसी दूसरी फसल लगानी होती है। इसलिए जल्दबाजी में किसान पराली (फस।ल अवशेष) को जला देते हैं । अधिकतर किसान हार्वेस्टर से फसल की कटाई करते हैं, जिससे उन क्षेत्रों में फसल के तने का अधिकतर भाग खेत में ही रह जाता है। खरीफ फसल को काटने के बाद किसान उन अवशेषों को जला देते हैं, जिससे वह फसल अवशेष बर्बाद हो जाता है
फसल अवशेष जलाने से मिट्टी का तापमान भी बढ़ता है। इस कारण मिट्टी में उपलब्ध जैविक कार्बन जल कर नष्ट हो जाता है। यह पहले से ही हमारी मिट्टी में कम है। इसके फलस्वरूप मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। मिट्टी का तापमान बढ़ने से मिट्टी में उपलब्ध सूक्ष्म जीवाणु व केंचुआ मर जाते हैं। इनके मिट्टी में रहने से ही मिट्टी जीवंत कहलाता है। अवेशेषों को जलाने से जमीन के लिए जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी हो जाती है। इस कारण उत्पादन घटता है।