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बिहार में होगी दूसरी हरित क्रांति, जरूरत है बदलाव की

पटना । बिहार में दूसरी हरित क्रांति हो सकती है। चावल उत्पादन के लिए अनुकूल सभी भौगोलिक स्थितियां (जलवायु, मिट्टी व पानी) बिहार के पास है। बिहार का श्रम दूसरे राज्यों को संवार रहा है। चावल उत्पादन में बिहार छठे स्थान पर है। बावजूद किसानों को उनकी उपज की अच्छी कीमत नहीं मिल रही है। ऐसी ही स्थिति पश्चिम बंगाल की भी है। यह कहना है देश में बासमती चावल के सबसे बड़े निर्यातक एवं राइस एक्सपर्ट अजय शर्मा का। वह ज्ञान भवन में आयोजित फूड शो 2018 को संबोधित कर रहे थे। 
फूड शो का आयोजन बिहार स्टेट राइस मिल एसोसिएशन ने किया था। फूड शो में राइस मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजू गुप्ता, बीआईए के अध्यक्ष केपीएस केशरी समेत सूबे के राइस मिलर्स बड़ी संख्या में मौजूद थे।   

राइस एक्सपर्ट अजय शर्मा ने बताया कि बिहार में चावल उद्योग आॅर्गेनाइज्ड नहीं है। कृषि कार्य में तकनीक व बीज पर रिसर्च काफी कम है। किसानों से धान खरीद की सरल  व्यवस्था होनी चाहिए ताकि उन्हें सही कीमत मिल सके। सरकार की कोशिश के बावजूद परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं है। इन मामलों में यूपी, एमपी, जम्मू, पंजाब, हरियाणा, उड़ीसा व गुजरात आगे हैं। चावल निर्यात में भारत का पहला स्थान है, लेकिन इसमें बिहार की भागीदारी काफी कम है। 

बिहार में चावल की 110 वेरायटी का उत्पादन होता है, लेकिन इससे कोई लाभ नहीं है। वजह उत्पादन काफी कम है। चावल में बिहार की पहचान बने। इसके लिए बिहार राइस नाम से ब्रांड तैयार हो। बिहारशरीफ, भागलपुर व चंपारण के चावल मशहूर हैं। यहां धान की फसल तैयार होने की अवधि भी लंबी है जबकि कई राज्य अधिकतम 90 दिन में फसल तैयार कर रहे हैं। खेत में फसल अधिक दिन तक रहने का असर जमीन की उत्पादकता पर पड़ता है। सब्जी व फल के उत्पादन में भी बिहार बेहतर स्थिति मे है, लेकिन कोई पोपुलर ब्रांड यहां का नहीं बन सका है।           
 


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