पटना । नदियों में गाद प्रबंधन की राष्ट्रीय नीति बननी चाहिए। बिहार की पहल पर केंद्र सरकार ने गाद समस्या के अध्ययन के लिए एक कमिटी का गठन किया है। बिहार की गरीबी, पिछड़ेपन और पलायन का मुख्य कारण हर साल आने वाली बाढ़ है। गाद के कारण बाढ़ का फैलाव क्षेत्र बढ़ा है। हर साल बाढ़ से राहत व बचाव कार्य पर सरकार की बड़ी राशि खर्च होती है। इससे विकास के अन्य कार्य प्रभावित होते हैं। उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने होटल मौर्य में नदियों में गाद प्रबंधन पर आयोजित सेमिनार को संबोधित करते हुए उक्त बातें कहीं।
क्लाइमेट चेंज के कारण भी कई तरह की परेशानियां पैदा हुई हैं। पिछले साल एक महीने में जितनी बारिश होती है, उतनी तीन दिनों में अररिया और किशनगंज के इलाके में हुई। इससे वहां के लोगों को बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ी। इस साल कोसी के इलाके में तापमान में आई गिरावट से मक्के की फसल में दाने नहीं आए। मौसम परिवर्तन, गाद और बाढ़ का आपसी संबंध है। रिवर हेल्थ एसेसमेंट के जरिए इसे नियंत्रित करने की जरूरत है।
मोदी ने कहा कि हाल के वर्षों में बिहार की सभी नदियों में गाद का काफी जमाव हुआ है। बूढ़ी गंडक को छोड़कर बिहार की सभी नदियों का उद्गम नेपाल है। हाल के दिनों में नेपाल में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई है। इस कारण बारिश में वहां से आने वाली नदियां काफी मात्रा में गाद लेकर आती हैं। इस कारण नदियों में जगह-जगह 15-20 फीट तक के टीले बन जाते हैं और पानी का प्रवाह बाधित होता है। इस कारण नदियां अपना रास्ता बदल रही हैं और नये-नये क्षेत्रों में बाढ़ से परेशानी हो रही है।
जल संसाधन मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि नेपाल एवं पड़ोसी राज्यों में भी अधिक बारिश के कारण बिहार में तबाही आती है। चार-पांच महीने विकास का काम ठप रहता है। विशेषज्ञों को समस्या का निदान खोजना चाहिए। आईआईटी कानपुर के प्रो. राजीव सिन्हा, एक्शन ऑन क्लाइमेट चेंज टूडे की डॉ क्रिस्टिना रंबाइटिस और विद्या सौंदर्यन ने भी विचार रखे। मौके पर प्रधान सचिव अरुण कुमार सिंह भी मौजूद थे।