पटना/बिहार कारोबार न्यूज । राज्य सरकार टास्क फोर्स गठित कर बिहार के लिए बांस नीति (बैम्बू पाॅलिसी) बनायेगी। बिहार के किसान, कारीगर व उद्यमी प्रशिक्षण के लिए असम, त्रिपुरा व मिजोरम भेजे जायेंगे। अररिया टिश्यू कल्चर लैब में ट्रेनिंग सेंटर स्थापित कर स्कील डेवलपमेंट और बांस की खेती का प्रशिक्षण दिया जायेगा। उक्त जानकारी उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने दी। वह होटल मौर्या में पर्यावरण व वन विभाग की ओर से पहली बार आयोजित ‘बैम्बू काॅन्क्लेव’ के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।
उप मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस तरह बकरी गरीबों की गाय होती है, उसी तरह बांस गरीबों की लकड़ी है। इसे हरा सोना भी कहा गया है। भूक्षरण रोकने के कारण बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों के लिए बांस वरदान है। राज्य सरकार ने नहर और तटबंध के किनारे बांस लगाने का निर्णय किया है। बांस 30 फीसदी ज्यादा आॅक्सीजन उत्सर्जित करता है। इसकी खेती कर किसान 120 वर्षों तक लाभ ले सकते हैं। इस कार्य में उद्यमियों का भी सहयोग जरूरी है।
भागलपुर, कोसी व पूर्णिया समेत सूबे में बड़े पैमाने पर बांस की खेती को बढ़ावा दिया जायेगा। भागलपुर के टीएनबी काॅलेज में स्थापित बिहार के पहले बैम्बू टिश्यू कल्चर लैब की क्षमता सालाना 1.5 लाख से बढ़ा कर 3 से 5 लाख सीडलिंग की जायेगी। सुपौल में शीध्र टिश्यू कल्चर लैब काम करना शुरू कर देगा। अररिया टिश्यू कल्चर लैब की क्षमता क्रमबद्ध तरीके से सालाना 8-10 लाख सीडलिंग होगी। नेशनल बैम्बू मिशन को कृषि विभाग से अलग कर पर्यावरण व वन विभाग में शामिल किया जायेगा। केंद्र सरकार ने 2018-19 और 2019-20 के लिए 1290 करोड़ का प्रावधान किया है।
कृषि मंत्री : कृषि मंत्री डाॅ प्रेम कुमार ने कहा कि किसानों की आमदनी बढ़ाने में बांस की खेती सहायक होगी। धार्मिक महत्व के साथ यह पर्यावरण संरक्षण में भी सहायक है। उत्तर बिहार के 13 जिलों में बांस की खेती हो रही है। इसे बढ़ाने की जरूरत है।
इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री गिरिरज सिंह, कृषि वैज्ञानिक, प्रधान सचिव त्रिपुरारी शरण, प्रधान मुख्य वन संरक्षक डीके शुक्ला, अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक यूएस झा समेत विभाग के अधिकारी एवं कर्मी उपस्थित थे।