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कामयाबी के लिए याद रखें श्रीकृष्ण का मूलमंत्र

पार्थसारथी कृष्ण का मूल मंत्र है कभी भी पीछे नहीं हटना। जहां रणकौशल के कारण दो कदम पीछे हटना पड़ा, वहां बौद्धिक रणकौशल से कई कदम आगे बढ़ जाना। कैसे जरासंध बार-बार मथुरा पर आक्रमण कर रहा था। इस कारण जरासंध के हाथ से मथुरा को बचाने के लिए वहां से राजधानी हटाई गई। द्वारका जाने के लिए मरुभूमि को पार करना पड़ता है। जरासंध तो वह कर नहीं पाएगा और द्वारका चले गए। वास्तव में यह पीछे हटना मानसिक जगत में एक कदम आगे बढ़ने के बराबर है अर्थात् जरासंध के समान एक समाज-विरोधी तत्व को काबू करने के लिए नए पथ की उद्भावना की गई है।

हालांकि टकराव टालने का मतलब जरासंध की बुराइयों से समझौता नहीं है। उससे टकराव चलता रहा जो आखिर में भीम के हाथों जरासंध की मौत पर जाकर समाप्त हुआ। गौर करने की बात है कि जरासंध की मृत्यु में कृष्ण का भी सहयोग था। उन्होंने ही तिनके के जरिए संकेत से भीम को समझाया कि जरासंध को कैसे मारना चाहिए। बहरहाल इसमें दो राय नहीं कि कृष्ण ने व्यावहारिक और व्यक्तिगत जीवन में दिखा दिया कि अच्छा आदमी कैसे बना जा सकता है। 

ये जो पार्थसारथी हैं । इनके बारे में जो सोचेगा, जो इन्हें हृदयासन पर बैठाकर रखना चाहेगा, जो इनकी ओर दौड़ जाना चाहेगा और उन्हें खींचकर अपनी ओर लाएगा। वह इस प्रकार पार्थ-सारथी के द्वारा पार्थसारथी भाव का अनुभव करेगा और उनमें मिल कर एक हो जाएगा। पार्थसारथी ने क्या किया ? मनुष्यों के मध्य जो बुद्धिमान हैं, जो कल्याणकारी हैं, उनके मध्य अपने को मिला दिया यानी उसे मुक्ति का पथ दिखाया।  

                                                                                                                                                               -- श्री आनंद मूर्ति


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