मुजफ्फरपुर/सबौर । बिहार की शाही लीची को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है। भारत सरकार की भौगोलिक दर्शन पत्रिका में शाही लीची ( जीआई आवेदन संख्या 552) को राज्य के बौद्धिक संपदा अधिकार अंतर्गत प्रकाशित किया गया है। चेन्नई स्थित रजिस्ट्रार आॅफ जियोग्राफिकल इंडिकेशन ने 5 अक्टूबर, 2018 को संबंधित प्रमाणपत्र जारी किया है। इससे पहले बिहार के जर्दालु आम, कतरनी धान एवं मगही पान को पहचान मिल चुकी है।
बिहार लीची उत्पादक संघ, डुमरी, मुजफ्फरपुर ने शाही लीची की मान्यता के लिए 20 जून 2016 को आवेदन दिया था। संघ के अध्यक्ष बच्चा प्रसाद सिंह ने बताया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की मदद से बिहार को यह सफलता मिली है। मान्यता मिलने से हमें मार्केटिंग में सुविधा होगी और इसका लाभ उत्पादकों को मिलेगा।
बिहार के अलावा बंगाल, देहरादून-नैनीताल के मैदानी क्षेत्र एवं पठानकोट (पंजाब) में भी लीची का उत्पादन हो रहा है, लेकिन बिहार की शाही लीची नेे अन्य वैरायटी को पीछे छोड़ दिया है। बिहार के मुजफ्फरपुर, वैशाली, मोतिहारी, समस्तीपुर एवं नवगछिया (भागलपुर) लीची उत्पादक क्षेत्र हैं।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की वैज्ञानिक डॉ रूबी रानी का कहना है कि शाही लीची की पहचान 50 साल पुरानी है। इसमें खास स्वाद व सुगंध है, जो लीची की किसी दूसरे वैरायटी में नहीं है। इसके बीज काफी छोटे होते हैं।