सबौर (भागलपुर)। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) परिसर में गाजर घास (पार्थेनियम) जागरूकता सप्ताह का आयोजन 16 से 22 अगस्त तक किया गया है। अभियान में गाजर घास से होने वाले दुष्प्रभावों जैसे एलर्जी, एग्जिमा एवं बुखार जैसी बीमारियों पर चर्चा हुई।
गाजर घास मैक्सिको से भारत आया। इसका फैलाव हवा, पानी, जानवर, गाड़ी एवं फार्म मशीनों से अधिक होता है। गाजर घास को कांग्रेस घास, गांधी टोपी, चटक चांदनी नामों से भी जाना जाता है। प्रायः सड़क, रेल लाईन, खाली जगह एवं फसल में भी उग आते हैं, जो वातावरण के लिए हानिकारक हैं।
इसके रोकथाम के लिए घास में फूल आने के पहले इसे उखाड़ना अधिक लाभप्रद है। इस घास को फूल आने से पहले कम्पोस्ट बना कर खेतों में उपयोग किया जाना चाहिए। इसके रोकथाम के लिए जाईगोग्रामा बाईकोलोराॅटा नामक बिटल का भी उपयोग किया जाता है।
विश्वविद्यालय के निदेशक सीड एवं फार्म डाॅ पी. के. सिंह, बिहार कृषि महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ आर.पी.शर्मा, डाॅ एस.के पाठक एवं डाॅ एम. के. बाधवानी ने मार्गदर्शन किया। अभियान में डाॅ संजय कुमार, डाॅ वीरेंद्र कुमार, डाॅ राकेश रंजन, डाॅ यानेंद्र कुमार सिंह, डाॅ शशिकांत, डाॅ शंभु प्रसाद, डाॅ एस.के.गुप्ता एवं डाॅ महेश कुमार सहित सभी वैज्ञानिक, छात्र एवं गैर शिक्षकेतर कर्मचारियों ने भी भाग लिया।