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बढ़ती इच्छाओं को रोकना ही तप है ः आचार्य भद्रबाहु

पटना। जैन मुनि आचार्य भद्रबाहुजी ने कहा कि पर्युषण पर्व में आत्मा के दस स्वभाव पर विजय पाने की जानकारी दी जाती है। पर्युषण पर्व का सातवां दिन ‘उत्तम तप ’ दिवस है। उत्तम तप से मतलब है अपने आप को तपाना। इच्छाओं का निरोध करना तप है। तप से सांसारिक भोग की अभिलाषा से विरक्त हो सकते हैं। 

आचार्य भद्रबाहु कांग्रेस मैदान, कदमकुआं के समीप दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व के सातवें दिन के महत्व को बता रहे थे। मीठापुर, मुरादपुर एवं गुलजारबाग जैन मंदिरों में भी शांति धारा पूजा हुई। उन्होंने कहा जिस तरह सोने को तपाने पर वह समस्त मैल छोड़कर शुद्ध हो जाता है और चमकने लगता है। उसी तरह पांच इंद्रियों एवं मन को वश में करना या बढ़ती हुई लालसाओं एवं इच्छाओं को रोकना तप है। 

आचार्य भद्रबाहुजी ने कहा कि दो तरह के मार्ग हैं। एक साधनों का और दूसरा साधना का मार्ग है। साधनों का मार्ग सुख सुविधा का मार्ग है और साधना का मार्ग स्वतंत्र स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है। तप की आग में पूर्व के कर्मो का प्रज्ज्वलन हो जाता है तब आत्मा अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में चमकती है। आचार्य भद्रबाहुजी ने कहा कि बिना साधना एवं तपस्या के कुछ प्राप्त नहीं होता। भोग की जगह योग और त्याग को स्थान मिला है।  

जैन मंदिर में एमपी के दमोह से आये डॉ आशीष जैन ने सैकड़ों की संख्या में उपस्थित जैन श्रावकों को मानव धर्म उत्तम तप धर्म की संगीतमय पूजा कराई। जबलपुर से आयीं मशहूर संगीतकारा भावना जैन की पार्टी पूजा में सहयोग कर रही है। 

पर्युषण के सातवें दिन की शांतिधारा करने का सौभाग्य निर्मल मनोज बडजात्या एवं महाआरती का सौभाग्य विमल जी पाटनी परिवार को प्राप्त हुआ। महाराज जी को शास्त्र भेंट करने का सौभाग्य गीता जैन एवं अखिलेश जैन परिवार, संजय सेठी, अशोक कुमार व दीपक कुमार बड़जात्या परिवार को प्राप्त हुआ। 

कार्यक्रम में महासचिव रतनलाल जैन, महावीर प्रसाद काला, प्रदीप छाबड़ा, अशोक गांगिल, सुभाष छाबड़ा, शकुंतला काशलीवाल एवं निशा पाटनी के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। 
 


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