पटना। बिहार की सुस्त पड़ी राइस मिल प्रवासी श्रमिकों के रोजगार सृजन में सहायक हो सकती है। सूबे में करीब पांच हजार राइस मिल हैं। इनमें मात्र दो हजार ही चालू स्थिति में हैं, लेकिन इनकी भी स्थिति ठीक नहीं है। यदि इस क्षेत्र को सरकार का सहयोग मिल जाये, तो करीब 15 लाख लोगों को रोजगार मिल सकता है।
बिहार स्टेट राइस मिल एसोसिएशन का कहना है कि इंडस्ट्री को आर्थिक सहायता मिलने से इसे फिर से खड़ा किया जा सकता है। लंबे समय से हमारी मांग रही है कि राइस मिल को कृषि उद्योग का दर्जा देते हुए धान खरीद एजेंसी में शामिल किया जाये। इस सबंध में राज्य सरकार का कई बार ध्यान आकृष्ट कराया गया है।
अध्यक्ष राजू गुप्ता ने बताया कि राइस मिल को धान की खरीद एजेंसी बनाने से किसान एवं मिलर्स दोनों को फायदा होगा। बिहार में दो एजेंसी होने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और किसानों को उचित समर्थन मूल्य मिलने लगेगा। इससे किसान औने-पौने दाम में धान बेचने के लिए मजबूर नही होंगे। बंद पड़ी राइस मिल के खुल जाने से यह क्षेत्र रोजगार सृजन में काफी मददगार होगा।
बिहार में एक करोड़ तीस लाख मीट्रिक टन धान का सालाना उत्पादन होता है। इसके विपरीत पिछले आठ वर्षों से धान की खरीद मात्र आठ लाख मीट्रिक टन चावल तैयार करने के लिए होती है।
राज्य में लगभग 40 लाख मीट्रिक टन चावल का वितरण पीडीएस के जरिये होता है। 25 से 28 लाख मीट्रिक टन चावल अन्य प्रदेशों से आता है। इससे किसानों को काफी नुकसान हो रहा है। साथ ही सरकार को बाहर से चावल मंगाने पर इसके परिवहन पर बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। एसोसिएशन ने सरकार को आश्वस्त किया है कि नीति में बदलाव होने से बिहार कई राज्यों से आगे बढ़ जायेगा।