वैशाली/पटना। वासोकुंड में विराजमान दिगंबर जैन मुनि आचार्य रत्न विशुद्ध सागर ने कहा कि सत्य का पालन किये बिना अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाता। साधना सफल नहीं हो पाती। सत्य बोलने से कोई विपत्ति में पड़ जाये और किसी की जान चली जाये, तो ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए। अगर शिकारी पूछे कि मेरे शिकार को देखे हो। ऐसे में सत्य बोलने से निर्दोष प्राणी की जान चली जायेगी। इसलिए ऐसा सत्य नहीं बोलना चाहिए।
दस दिवसीय महापर्व पर्युषण के पांचवें दिन उत्तम सत्य धर्म की पूजा हुई। जैन समाज के एम. पी. जैन ने बताया कि सत्य का बोध होने पर शब्द की आवश्यकता नहीं होती है। जैसे गुड़ मीठा होता है। यह सत्य है, लेकिन शब्दों में नहीं कह सकते हैं कि उसका स्वाद किस तरह का है।
सत्य दो तरह का होता है। जैन मुनियों का सत्य केवल सत्य होगा। जबकि गृहस्थ के सत्य में अलंकारयुक्त या भाव युक्त झूठ हो सकता है। किसी को कहे कि आपका तेज सूर्य के सामान है। यह अलंकारयुक्त सत्य है। सत्य आत्मा का स्वाभाविक गुण है। सत्य आचरण के बिना आत्म शुद्धि असंभव है। सत्य ही आत्मा का धर्म है। जो मनुष्य तप एवं साधना से सत्य को प्राप्त कर लेता है। वह अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर सकता है।
मीठापुर दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण के पांचवें दिन की शांतिधारा अशोक कुमार, वैभव कुमार जैन एवं संध्या आरती कन्हैयालाल सूरजमल बडजात्या जैन की ओर से पुजारियों ने की। अध्यक्ष विजय जैन कासलीवाल भी मौजूद थे। मुरादपुर दिगंबर जैन मंदिर में भी शांतिधारा पूजा हुई। कांग्रेस मैदान स्थित दिगंबर जैन मंदिर के महासचिव कैलाश चंद जैन ने बताया कि सभी श्रद्धालु अपने अपने घरों से ही पर्युषण की पूजा कर रहे हैं।