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अहंकार की भावना से दान नहीं करना चाहिए : जैन मुनि

वैशाली/पटना। वासोकुंड से जैन मुनि आचार्य रत्न विशुद्ध सागर ने ऑनलाइन प्रवचन में कहा कि अहंकार की भावना से त्याग और दान नहीं करना चाहिए। त्याग करने के बाद मन में पश्चाताप नहीं रहे। पांच पापों का अवश्य त्याग करें। त्याग धर्म है। 

त्याग अंदर की इच्छा होने पर ही संभव है। दान का अर्थ देना नहीं बल्कि त्याग है। त्याग करके खुश होना चाहिए। किसी के कहने पर अति उत्साह में त्याग नहीं करें। त्याग के बाद कुछ पाने का भाव हो, तो यह त्याग नहीं है।

दिगंबर जैन समाज के दस दिवसीय महापर्व पर्युषण के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की पूजा हुई। जैन समाज के एम.पी.जैन ने बताया कि त्याग शब्द का अर्थ है देना या छोड़ना। त्याग के बिना हमारा जीवन अधूरा है। त्याग एक ओर जहां हमें परिग्रह से मुक्ति दिलाता है, तो दूसरी ओर हमें शांति और सुकून का अहसास भी कराता है। 

आध्यात्मिक दृष्टि से त्याग का अर्थ भोग एवं परिग्रहों का त्याग है। त्याग करने वाला अपने पास संचित वस्तु, पदार्थ, औषधि एवं ज्ञान का कुछ अंश दूसरों को दान में देकर ही संतुष्ट नहीं हो जाता। बल्कि वह लोभ एवं मोह आदि विकारों का त्याग करता है। 

दान हमेशा जरूरतमंद को ही करना चाहिए। अपनी आय का कुछ न कुछ हिस्सा अवश्य दान करें। तप की अग्नि में विकारों को जलाना त्याग है। त्याग का संबंध व्यक्ति की मानसिकता से है, जिससे द्रव्यों के प्रति उसका मोह नहीं रह जाता है।

उत्तम त्याग में व्यक्ति अपनी कीर्ति, प्रशंसा एवं यश की कामना नहीं करता है। त्याग से व्यक्ति के जीवन में संतोष एवं शांति का पोषण होता है। दया एवं सेवा की भावना का विकास होता है। उसका चित्त उदार बनता है। 

मीठापुर दिगंबर जैन मंदिर में शांतिधारा एवं संध्या आरती मानिकचंद राजकुमार जैन पाटनी की ओर से पुजारियों ने की। कांग्रेस मैदान स्थित दिगंबर जैन मंदिर में भगवान की पूजा एवं अभिषेक पुजारी विकास एवं जिनेश जैन कर रहे हैं।
 


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