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उद्योग की रीढ़ है स्टील इंडस्ट्री, समस्याओं का होगा निदान

पटना। बिहार के स्टील उत्पादकों को उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन ने आश्वस्त किया है कि उनकी सभी समस्याओं का निदान होगा। स्टील इंडस्ट्री किसी भी राज्य के उद्योग की रीढ़ होती है। उन्होंने कहा हमें पुराने एवं बंद पड़े उद्योगों को भी खड़ा करना है और नए उद्योग भी लगाने हैं। बिहार का औद्योगीकरण ही मेरा लक्ष्य है। अब तक 501 एकड़ जमीन नए उद्योग के लिए बियाडा को दे चूका हूं।

उद्योग मंत्री होटल मौर्या में बिहार स्टील उत्पादक संघ के साथ संवाद कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। संवाद का विषय बिहार में स्टील उद्योग के समक्ष चुनौतियां और अवसर था।

बिजली अनुदान, उद्योग के लिए फीडर एवं इस्पात की आपूर्ति से जुड़ी समस्याओं पर उद्योग मंत्री ने कहा कि यह सौभाग्य की बात है कि केंद्रीय ऊर्जा एवं इस्पात मंत्री दोनों बिहार से हैं। इसलिए बिहार के स्टील उद्योग को चिंता करने की जरूरत नहीं है। जो भी परेशानी है उसे केंद्र और राज्य सरकार मिलकर दूर करेगी।

सरकार की पूरी कोशिश होगी कि राज्य में स्टील का उत्पादन बढ़े और उत्पादन एवं खपत को बराबर करने का लक्ष्य हासिल हो सके। उन्होंने संघ को सुझाव दिया कि बिहार ब्रांड के नाम से राज्य के सभी स्टील ब्रांड को एक जगह करें।

इससे यह जानकारी मिलेगी कि सभी उत्पाद बिहार में निर्मित हैं। उन्होंने गलत तरीके से राज्य में आ रहे सरिया पर रोक लगाने की भी बात कही। विधायक शालिनी मिश्रा ने कहा कि उद्योग विभाग के प्रयास से राज्य का स्टील उद्योग और मजबूत होगा।  

संवाद के क्रम में दादीजी स्टील के शिशिर अग्रवाल ने कहा कि मेक इन इंडिया की तरह मेक इन बिहार का भी लोगो होना चाहिए। इस सुझाव का उद्योग मंत्री ने समर्थन किया। एक कारोबारी ने यूनिट के मेंटेनेंस के दौरान साल में एक माह के लिए बिजली शुल्क में मिनिमम गांरटी से राहत देने की मांग रखी।

बिहार स्टील उत्पादक संघ के उपाध्यक्ष रमेश चंद्र गुप्ता ने कहा कि यदि हमारी समस्याओं का समाधान निकलता है, तो संघ राज्य सरकार का आभारी होगा। यह समाधान कारोबार, राजस्व एवं रोजगार के ख्याल से महत्वपूर्ण होगा। संघ के अध्यक्ष प्रभु दयाल भरतिया, सचिव संजय भरतिया एवं बासुदेव सर्राफ ने भी अपने विचारों को रखा। कार्यक्रम में राज्य के स्टील उद्योग से जुड़े कई उद्यमी मौजूद थे।   

स्टील उद्योग के विकास के लिए संघ के सुझाव :  बीआईएस मान्यता होने के बावजूद बिहार में निर्मित स्टील सामग्री की सरकारी खरीद नहीं हो रही है। इसके विपरीत पश्चिम बंगाल की एक कंपनी को एप्रुवल दिया गया है। इस कारण स्थानीय उद्योग को सरकार के स्तर पर बढ़ावा नहीं मिल रहा है।

कच्चे सामान की सुगम आपूर्ति के लिए सेल के साथ स्टील आधारित यूनिट के एमओयू को रिवाइज किया जाना चाहिए। भू जल उपयोग के संबंध में बने राज्य सरकार के एक्ट को शीघ्र प्रभाव में लाया जाए। माप-तौल विभाग से एकमुश्त पांच वर्षों के लिए लाइसेंस मिले।

बिहार में स्टील उत्पादन से जुड़ी यूनिट कच्चे माल की आपूर्ति के लिए झारखंड एवं उड़ीसा पर निर्भर है। इस कारण 1500 से 2000 प्रति टन मालभाड़ा लग रहा है। बाहर की यूनिट के साथ प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए यह जरूरी है कि कच्चे माल के लिए कुछ माला भाड़ा अनुदान मिले।

गैस पाइप लाइन का लाभ इंडस्ट्री को भी मिलना चाहिए। वर्तमान में कोयले की उपलब्धता और दर स्टील उद्योग के अनुकूल नहीं है।

 

 

 


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