पटना। राज्य सरकार देसी नस्ल की गायों के संरक्षण और संवर्धन पर काम कर रही है। ग्रामीण समाज में पशुधन का काफी महत्व है। देसी गाय के दूध,गोबर और मूत्र उपयोगी हैं। उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद ने बामेती सभागार में आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला में ये बातें कहीं।
उन्होंने कहा कि गोवंश हमारी प्राचीन संस्कृति का हिस्सा रही है। इसमें गौशालाओं की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। गौशाला का संचालन एक परोपकारी कार्य है। इसका उद्देश्य देसी गोवंश का संरक्षण, संवर्धन एवं रख-रखाव के साथ कमजोर एवं बेसहारा गोवंश पशुओं को आश्रय देना है। बिहार के 33 जिलों में 86 निबंधित गौशालाएं हैं। इनमें 55 क्रियाशील और 31 अक्रियाशील हैं।
उपमुख्यमंत्री ने कहा कि गौशाला के कुशल प्रबंधन और विकास में गौशाला अध्यक्ष सह अनुमंडल पदाधिकारी की बड़ी जिम्मेवारी है। कार्यशाला में मौजूद सभी गौशाला के अध्यक्ष एवं सचिव से उन्होंने कहा कि पांच जिलों बांका, कैमूर, पूर्णिया, अरवल और शिवहर में निबंधित गौशालाएं नहीं हैं। इसके लिए विशेष पहल करें।
गाय के गोबर और मूत्र मिट्टी के लिए उपयोगी हैं। आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से गोबर गैस एवं वर्मी कंपोस्ट के प्लांट लगने से गौशालाओं की आय में वृद्धि होगी। उन्होंने कहा कि गोवंश के संरक्षण और विकास के लिए अन्य राज्यों में संचालित कार्यक्रमों का भी अध्ययन करने की जरूरत है।
पशुपालन निदेशक विजय प्रकाश मीणा ने गौशाला से संबंधित वैधानिक प्रावधान, गौशाला विकास योजना के समुचित क्रियान्वयन, कुशल प्रबंधन एवं चुनौतियों पर चर्चा की। इस अवसर पर पशुपालन के संयुक्त निदेशक डॉ प्रवीण कुमार पाठक एवं डॉ राजीव रंजन चौधरी, उप निदेशक डॉ रमाकांत प्रसाद, विभिन्न जिलों से आए अनुमंडल पदाधिकारी सह गौशाला अध्यक्ष एवं सचिव भी मौजूद रहे।