पटना। सामाजिक सद्भाव के प्रवर्तक गोस्वामी तुलसीदास विषय पर आयोजित गोष्ठी में पक्ष-विपक्ष दोनों तरह के वक्ताओं को तथ्यपरक तर्क रखने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन इस विषय पर विपक्ष में बोलने के लिए कोई सामने नहीं आया। रामचरितमानस पर बिहार के शिक्षा मंत्री की आलोचना से उभरे विवाद के बाद महावीर मंदिर ने विद्वानों की एक गोष्ठी विद्यापति भवन में बुलाई थी।
गोष्ठी में आचार्य किशोर कुणाल ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास और रामचरितमानस पर महावीर मंदिर की ओर से एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन होगा। इसकी तारीख और कार्यक्रम की घोषणा शीघ्र की जाएगी।
विद्यापति भवन में आयोजित गोष्ठी में किशोर कुणाल ने कहा कि संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने संसार को सियाराममय जाना। जड़-चेतन का भी भेद नहीं समझा। उन्होंने रामचरितमानस में निषादराज, केवट, माता शबरी आदि को जो उच्च स्थान दिया है, वह अद्वितीय है।
जब भरत जी निषादराज से मिलते हैं, तो उन्हें भ्राता लक्षमण जैसा स्नेह करते हैं। गुरु वशिष्ठ भी निषादराज से उसी भाव से मिलते हैं। शबरी के जूठे बेर श्रीराम को इतने प्रिय लगे कि नाते-रिश्तेदारी में भी वे इसका बखान करते थे।
मनुष्य जाति से अलग पक्षियों में निम्न समझे जाने वाले गिद्ध जटायु का अंतिम संस्कार श्रीराम ने अपने परिजन की तरह किया। रामचरितमानस के ऐसे प्रसंग गोस्वामी तुलसीदास को समदर्शी महात्मा के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। आचार्य किशोर कुणाल ने कहा कि तुलसीदास एक विरक्त महात्मा थे। उनको किसी पक्ष से कोई मतलब नहीं था।
गोष्ठी के पहले वक्ता के रूप में जनवादी लेखक बाबूलाल मधुकर ने सनातन धर्मावलंबियों को रामचरितमानस और गोस्वामी तुलसीदास जी के संबंध में किसी भी तरह की भ्रांति और बहकावे में नहीं आने की जोरदार अपील की।
वक्ता सोनेलाल बैठा ने कहा कि रामचरितमानस में मानवता कूट-कूट कर भरी हुई है। इसको जानने-समझने के लिए अध्ययन और मनन-चिंतन की आवश्यकता है। रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ कृष्ण कुमार ने कहा कि रामचरितमानस जोड़नेवाला ग्रंथ है। व्याकरणाचार्य डॉ सुदर्शन श्रीनिवास शांडिल्य ने कहा कि रामचरितमानस में ढोल गंवार....चौपाई में ताड़ने का अर्थ संवारना है।
पूर्व आईएएस अधिकारी राधाकिशोर झा ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से सभी को भगवद् भाव से देखा है। अध्यक्षीय संबोधन में जस्टिस राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि रामचरितमानस में वे सारे विधि और निषेध हैं, जिनसे समाज में सुधार और निखार आता है।
महावीर मंदिर की पत्रिका धर्मायण के संपादक पंडित भवनाथ झा ने कहा कि किसी ग्रंथ के शब्दों का सही अर्थ जानने के लिए उस पंक्ति के पहले और बाद की पंक्तियों को पढ़ना आवश्यक है। अन्य वक्ताओं में डॉ जगनारायण चौरसिया, विजय श्री, दयाशंकर राय और डॉ त्रिपुरारी पांडेय शामिल रहे।
शंका समाधान सत्र में श्रोताओं की जिज्ञासा और प्रश्नों के उत्तर दिए गए। धन्यवाद ज्ञापन पूर्व विधि सचिव वासुदेव राम और मंच संचालन सहयोग प्राणशंकर मजूमदार ने किया।