नई दिल्ली/एजेंसी। रीयल्टी कंपनियों के संगठन ने कहा है कि देश में फ्लैट या मकान सर्किल रेट (सरकारी दर) से नीचे नहीं बेचा जा सकता है। इसकी वजह आयकर कानून है। संगठनों ने केंद्रीय वाणिज्य मंत्री के कम कीमत पर फ्लैट बेचने के आह्वान पर यह बात कही है।
क्रेडाई और नारेडको ने कहा कि सौदा मौजूदा सरकारी दर से 10 प्रतिशत या उससे नीचे होने पर मकान खरीदार और डेवलपरों पर कर का बोझ बढ़ेगा। सरकारी दर या सर्किल रेट न्यूनतम मूल्य है जो राज्य सरकार भूखंड, मकान, अपार्टमेंट या वाणिज्यिक संपत्ति बेचने के लिए तय करती हैं।
क्रेडाई के चेयरमैन जे शाह ने कहा कि कमजोर मांग से रीयल एस्टेट की स्थिति खराब है। कमजोर मांग की वजह जीएसटी, नया कानून रेरा, नोटबंदी, एनबीएफसी में नकदी संकट और मौजूदा कोविड-19 महामारी के कारण उत्पन्न बाधाएं हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के बाद कच्चे माल और श्रम की लागत बढ़ी है।
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने नारेडको के सदस्यों के साथ तीन जून को वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार यह देख रही है कि क्या सर्किल रेट में कुछ रियायत दी जा सकती है। अगर छूट की अनुमति नहीं मिलती है, तो बिल्डरों को नहीं बिके मकानों को कम कीमत पर बेचना चाहिए। बिल्डरों को यह चुनना है कि क्या वे अनबिके मकान और कर्ज भुगतान में चूक के साथ रहना चाहते हैं या फिर बड़ी संख्या में खाली पड़े आवास को बेचकर आगे बढ़ना चाहते हैं।
क्रेडाई और नारेडको दोनों ने आयकर कानून में संशोधन की मांग की है। उनका यह भी कहना है कि सर्किल रेट वास्तविक और बाजार दर के अनुसार होना चाहिए। अगर कुछ डेवलपर चुनिंदा शहरों में लागत कम करना चाहते हैं, तो वे ऐसा नहीं कर सकते हैं। इसका कारण मौजूदा आयकर कानून है। सरकार को मांग को गति देने के लिये जीएसटी दर, स्टांप शुल्क और मकान के कर्ज पर ब्याज दरों में कटौती करनी चाहिए।
नारेडको के अध्यक्ष नीरंजन हीरानंदानी ने कहा कि उनका संगठन तकनीकी समस्या को हटाने की मांग करता रहा है। अगर दाम तय दर से 10 प्रतिशत से अधिक घटाये जाते हैं, तो खरीदार और बिल्डरों पर अतिरिक्त कर बोझ पड़ेगा।