मुंबई/एजेंसी। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के निर्णय के अनुसार अब कंपनियों को ऋण चूक (डिफॉल्ट) से संबंधित पूरी जानकारी रेटिंग एजेंसियों को देना अनिवार्य होगा। यह निर्णय ऐसे स्थिति में किया गया है जब कंपनियों की ओर से ऋण की किस्त चुकाने में देरी या चूक होने की जानकारी नहीं दी जाती है। सेबी के निदेशक मंडल की बैठक में इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।
नियामक का कहना है कि इससे रेटिंग एजेंसियों को संभावित डिफॉल्ट के बारे में समय पर जानकारी मिल सकेगी। इस कदम से रेटिंग एजेंसियों को रेटिंग वाली इकाइयों की वित्तीय स्थिति का बेहतर तरीके से आकलन करने में मदद मिलेगी।
बड़ी कंपनियों के ऋण भुगतान में चूक के काफी मामले सामने आये हैं। इसके अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएलएंडएफएस) का मामला भी सामने आया है। इससे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी सवालों के घेरे में आ गई हैं।
रेटिंग एजेंसियां ने जिन प्रतिभूतियों या इकाइयों की रेटिंग दी है, उनकी संभावित जोखिमों का पता लगाने में वे विफल रही हैं। हालांकि, रेटिंग एजेंसियों ने इसका पूरा दोष कंपनियों पर डालते हुए कहा है कि उन्हें बैंक के ऋण भुगतान में विलंब या चूक से संबंधित पूरी जानकारी कंपनियां उपलब्ध नहीं कराती हैं।
गैर सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में यह समस्या और बढ़ जाती है। इन खामियों को दूर करने के लिए सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के संबंध में अपने नियमों में बदलाव किया है। ऐसे में किसी भी सूचीबद्ध या गैर सूचीबद्ध इकाई को रेटिंग हासिल करने से पहले रेटिंग एजेंसियों को अपने मौजूदा और भविष्य के कर्ज तथा ऋण भुगतान में विलंब या चूक की पूरी जानकारी देनी होगी।